डा॰ आद्या प्रसाद द्विवेदी
एम॰ए॰, पी॰एचडी॰
रीडर और अध्यक्ष, हिन्दी विभाग
सतीशचन्द्र स्नातकोत्तर कॉलेज, बलिया
पूर्व अधिष्ठता डीन कला संकाय
पूर्व सदस्य विद्या परिषद
पूर्व संयोजक हिन्दी अध्ययन परिषद एवं हिन्दी शोध समिति
वीर बहादुर सिंह पूर्वान्चल विश्वविद्यालय, जौनपुर
सदस्य कार्यकारिणी, भारतीय हिन्दी परिषद, इलाहाबाद
आवास
५८, टैगोर नगर, सिविल लाइन, बलिया २७७००१
फोन 05498-223870
मोबाइल 9415632538

डा॰ श्री अमर नाथ शर्मा, श्री राम आरोग्यालय, तीखमपुर, बलिया द्वारा श्री लक्ष्मीनारायण आर शर्मा को पत्र की शैली में लिखी गयी एक लम्बी टंकित पुस्तक को पढ़ने का अवसर मिला.
इस लम्बे पत्र को डा॰ अमरनाथ शर्मा ने डा॰ लक्ष्मीनारायण शर्मा की पुस्तक ब्रह्मभट्ट चरितम के कई महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर अपनी तार्किक आपत्ति प्रमाणों के साथ प्रस्तुत की है तथा तमाम ग्रन्थों का हवाला देकर अपनी असहमति व्यक्त की है. डा॰ अमरनाथ शर्मा के कथन तार्किक हैं तथा संस्कृत के आर्ष ग्रन्थों पर आधृत हैं, इसलिये उनके कथन में दर्पोक्ति नहीं अपितु दम परिलक्षित होता है.
ध्यातव्य है कि डा॰ शर्मा ने अपने कथन की सम्पुष्टि के लिये न केवल संस्कृत वाङ्मय के आकर ग्रन्थों का सन्दर्भ दिया है, अपितु ऐतिहासिक, सामाजिक, पौराणिक सभी आधारों का सहारा लिया है. इन सभी आधारों का सहारा लेकर शर्माजी ने बड़े ही विनम्र भाव से स्वीकार किया है कि यह शब्द कम से कम इस्वी सन के आसपास जिस समय दक्षिण भारत के आर्यीकरण की प्रक्रिया प्राम्भ हुई, उत्तर भारतीय ब्राह्मणों के बीच अस्तित्व में आ चुका था. उनका सप्रमाण यह कहना समीचीन प्रतीत होता है कि ऋषि अगस्त्य के नेतृत्व में जब आर्यों, ब्राह्मणों, का समूह दक्षिण भारत गया , उसी समय यह शब्द भी उत्तर भारत से दक्षिण भारत पहुंचा. कालान्तर मे जब जातियाँ बनीं तब यह भट्ट शब्द भी सम्पूर्ण भारत में जाति मूलक शब्द के रुप में स्थापित हो गया.
इतना ही नहीं डा॰ शर्मा ने लक्ष्मीनारायण जी के इस कथन पर अपनी घोर असहमति तर्क के साथ प्रस्तुत की है कि प्राकृत भाषा कब प्रचलित हुयी इस बात का पूरा पता नहीं. डा॰ शर्मा ने सप्रमाण ई॰पूर्व ५०० से १००० ई॰ तक प्राकृत भाषा का काल बताया है. इसी तारतम्य में डा॰ शर्मा ने चारण और भाट शब्द पर भी तमाम उद्धरणों को प्रस्तुत करते हुये गंभीरतापूर्ण ढंग से प्रकाश डाला है.
मुझे अतीव प्रसन्नता हो रही है कि डा॰ शर्मा ने अपनी लेखनी उठाने से पहले इस शब्द के संदर्भ में तमाम शब्दकोषों का अध्ययन तो किया ही है, भाषा विज्ञान और प्राचीन भारत के सुधी विद्वानों से विचार विमर्श भी किया है.
डा॰ शर्मा के कथन में तर्क है, गम्भीर चिन्तन है तथा सन्दर्भ ग्रन्थो का उद्धरण है.
मैं इनके इस साहसिक पत्र के तार्किक शैली की भूरि भूरि प्रशंसा करता हूँ तथा डा॰ शर्मा को आशीर्वाद देता हूँ कि उनकी अध्ययनशीलता और लगनशीलता इसी प्रकार बनी रहे.
