१३ मई २००७
आदरणीय श्री डा॰ अमरनाथ शर्मा,
सादर अभिवादन.
आपकी पत्रनुमा रचना का मैंने गहन अध्ययन किया और पाया कि आपने निस्चय ही एक detached observer की तरह विविध बिन्दुओं को विविध परिप्रेक्ष्य में अपने तर्कों से प्रस्तुत ओर रेखांकित करने का प्रयास किया है.
यह आपकी अध्ययनशीलता ओर लगनशीलता ही है जिससे आप भाषा विज्ञान और इतिहास के विविध तथ्यों को खंगालने में कोई कसर नहीं छोड़े हैं.
हालांकि आपकी यह रचना विविध बिन्दुओं को स्पर्श करती है लेकिन इसका एक महत्वपूर्ण अध्याय ब्रह्मभट्ट या भट्ट शब्द की उत्पत्ति और इस शब्द का जाति व्यवस्था में प्रवेश पर है. लेकिन इस रचना के इस महत्वपूर्ण अध्याय की प्रासंगिकता निश्चय ही जाति और धर्म से उपर है. आपकी रचना लोगों को यह सन्देश देने के लिये काफी है कि अपनी जाति और धर्म आदि की उत्पत्ति, प्रसार आदि के संबंध मेा illogical, irrelevant, uncanny और out of box विचारों से उपर उठने की आवश्यकता है.
मेरे समझ से आपकी रचना का एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष syncretic समन्वयवादी प्रवृति है. आपकी रचना यह संदेश देने में कामयाब रही है कि लोगों में सामाजिक सहअस्तित्व की भावना सामाजिक विकास और उनके विविध संघर्षों से निजात पाने का एक महत्वपूर्ण पहलू है.
जहाँ तक प्रश्न वाल्मिकी रामायण और बौद्ध हिन्दू संघर्ष का है, यहाँ पर मैं आपसे कुछ असहमत हूं. सौभाग्य से विगत वर्षों में मैंने काफी हद तक इतिहास का अध्ययन किया है और मेरा अध्ययन वामपंथी, दक्षिणपंथी, और मध्यमार्गी तीनों प्रविधियों तक विस्तृत है. निश्चय ही इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि सत्ता संघर्ष को लेकर बौद्धों और हिन्दुओं में कुछ मतभेद रहे और कुछ रक्तपात भी हुआ. लेकिन विचारणीय तथ्य यह है कि यह एक सीमित अवधि तक ही रहा और इतिहास के अन्य संदर्भों का संज्ञान लिया जाय तो इसे नगण्य कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा.
रही बात वाल्मिकी रामायण की, तो मेरा मानना यह है कि यह किन परिस्थितियों में लिखा गया, क्यों लिखा गया, कब लिखा गया आदि बिन्दुओं परआज तक इतिहासकारों के बीच कोई सहमति नहीं बन पाई है और न ही इस पर कोई सार्वभौमिक एतिहासिक समग्री उपलब्ध है. अतः इस पर गहन शोध की आवश्यकता है.
आपके निरन्तर आशीर्वाद का आकांक्षी,
शशिकान्त त्रिपाठी.
संपर्कः 9936289969