श्री लक्ष्मीनारायण आर॰शर्मा,
पहाड़पुर, बलया, जगदीशपुर, अम्बेडकरनगर, उत्तरप्रदेश २२४१९०
के नाम एक खुला पत्र
परम आदरणीय श्री शर्माजी,
सादर अभिवादन.
आपकी पुस्तक पढ़ते समय प्रायः आपसे सम्पर्क स्थापित करने की, कुछ चर्चा करने की, कुछ सीखने की आवश्यकता महसूस होती है, पर आपका स्वीच आफ मिलता है. आज भी ऐसा ही हुआ. फिर सोचा क्यों न पत्र ही लिखा जाय.
आपकी पुस्तक पढ़ते समय कुछ बिन्दु यथा - भट्ट शब्द की प्राचीनता, भट्ट शब्द की अखिल भारतीय उपस्थिति की व्याख्या, आपके द्वारा भट्ट शब्द की निष्पत्ति संस्कृत के भक्त शब्द से बताना तथा संस्कृत भाषा व्यवहार की भाषा पर , मैं बहुत प्रयास करने के बाद भी आपसे सहमत नहीं हो पा रहा हूँ. मुझे ऐसा लग रहा है कि इन पर विचार करते समय उतना ध्यान नहीं दिया गया जितना आवश्यक था.
भट्ट शब्द की प्राचीनता पर पूज्य डा॰सोम के विचार एवं इसके सार्वदेशिकता पर उनके सहित अन्य भी कई श्रद्धेय जनों के विचार पर सर्वप्रथम बात करना मुझे ज्यादा उचित लग रहा है.
मेरा मानना है कि भट्ट शब्द की अकिल भारतीय उपस्थिति के साथ ही इसकी प्राचीनता भी जुड़ी हुई है. मूलतः भट्ट शब्द की सर्वत्र व्यापकता को बौद्ध-ब्राह्मण संघर्ष की पृष्ठभूमि में दक्षिण के आर्यीकरण के साथ देखा जाना अधिक तर्क संगत है. साथ ही न केवल भट्ट शब्द की दक्षिण भारत में उपस्थिति तथा आर्यों का प्रसार ही एक दूसरे से जुड़ी घटनायें हैं, पर्त्युत बाल्मीकि रामायण का प्रणयन भी इसी बौद्ध ब्राह्मण संघर्ष के कारण बौद्ध धर्म के प्रभाव के उन्मूलानर्थ एवं ब्राह्मण धर्म, जिसका सम्मान मौर्य युग में काफी कम हो गया था, के पुनर्प्रतिष्ठार्थ हुआ है.
मेरे विचार यथासम्भव साक्ष्यों के साथ आपकी सेवा में निम्नवत निवेदित हो रहे हैं -
भट्ट भट्टारक और ब्रह्मभट्ट अध्याय के पृष्ठ 41 पर आप पूज्य डा॰ मुंशीराम शर्मा सोम के कथन को उद्धृत करते हुये लिखते है -
भट्ट शब्द स्वयं व्याख्या की अपेक्षा रखता है. संस्कृत के परवर्ती साहित्य में विशेषतया पांचवी शताब्दी में इस शब्द का प्रयोग बाहुल्य से हुआ है परन्तु संस्कृत के प्राचीन साहित्य में इसका उल्लेख कहीं नहीं हुआ है.
इस सन्दर्भ में पूज्य डा॰ सोम के प्रति पूरी श्रद्धा रखते हुये भी मैं यह कहना चाहूँगा कि इससे कदापि सहमत नहीं हुआ जा सकता. आपके इसी पुस्तक का अध्याय 24 महर्षि ब्रह्मराव का दिव्य प्राकट्य इसका खण्डन करता है जिसे आपने श्री स्कन्द पुराण से लिया है. इस पुस्तक की भूमिका लिखते समय त्रिभुवन नाथ शर्मा मधु ने भी ब्रह्म भट्ट ब्राह्मण की उत्पत्ति, विकास और उसके कार्य तथा उनके महत्ता की जानकारी से सम्बन्धित जिन प्राचीन ग्रन्थों के नामोल्लेख किया है ये सभी ग्रन्थ पांचवी सदी से बहुत पहले के हैं. क्रम संख्या 17, 18, 19, 20, 21, 22 में ऋगवेद का उल्लेख है. जिसका काल ई॰पू॰ 1500 से ई॰पू॰ 1000 के बीच का माना गया है. (प्राचीन भारत का इतिहास, भारत में आर्य तथा पूर्व वैदिक भारत, पृष्ठ 501) इसीमें महाभारत अनुशान पर्व के भी कई अध्यायों का उल्लेख है जो पांचवी सदी से पूर्व के हैं, क्योंकि महाभारत की रचना का मूल समय भी ई॰पू॰ चौथी शताब्दी माना गया है तथा इसके वर्तमान स्वरुप की तिथि चौथी सदी इस्वी निर्धारित की गयी है. (प्राचीन भारत का इतिहास, महाकाव्य काल, प्रा॰ भा॰ का इतिहास, पृष्ठ 78) जेमनीय ब्राह्मण ब्राह्मण ग्रन्थ है जिनका समय ई॰पू॰ 1000 से 600 तक माना जाता है.(प्राचीन भारत का इतिहास, उत्तर वैदिक काल, पृष्ठ 63 )
इस सूची में कई पुराणों का भी उल्लेख है जो पाँचवी सदी पूर्व के हैं. पुराण भी ब्राह्मण ग्रन्थों में ही आते हैं. इसी पुस्तक में अध्याय 27 का शीर्षक है ' बाल्मीकि और तुलसीकृत रामायणों में भट्ट ब्राह्मणों का प्रसंग'. आपने इस अध्याय में जिन उदाहरणों को रखा है, यद्यपि इनमें स्पष्ट रूप से भट्ट शब्द का उल्लेख नहीं हुआ है, उनके अनुसार बाल्मीकि रामायण में भट्ट ब्राह्मण के उल्लेख को स्वीकार किया जाय तो उससे भी डा॰सोम की बात गलत सिद्ध होती है क्योंकि बाल्मीकि रामायण का काल भी ई॰पू॰ चौथी सदी से अन्तिम रूप से दूसरी शताब्दी माना जाता है.
पूज्य डा॰सोम के इस कथन को गलत सिद्ध करने के लिये वाग्भट्ट का उल्लेख अकेला ही पर्याप्त है. भारतीय चिकित्सा शास्त्र के जो तीन बड़े नाम हैं वाग्भट्ट उनमें से एक है. दो अन्य नाम हैं चरक और सुश्रूत. चरक के नाम से जहां चरक संहिता है, वहीं सुश्रूत के नाम से सुश्रूत संहिता. चरक संहिता, सुश्रूत संहिता तथा वाग्भट्ट का अष्टांग संग्रह आज भी भारतीय चिकित्सा विज्ञान (आयुर्वेद)के मानक ग्रन्थ हैं. इन ग्रन्थों की प्रामाणिकता और प्रासंगिकता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि जहाँ ग्रीक और रोमन चिकित्सा पद्धतियों की तत्कालीन पुस्तकों के नाम स्वयं उस चिकित्सा पद्धति के चिकित्सक नहीं बता सकते ये ग्रन्थ आज भी पाठ्यक्रम के अंग हैं. ज्ञान भारती, लखनऊ से प्रकाशित अष्टांग संग्रह सूत्र स्थानम् के व्याख्याकार डा॰रविदत्त त्रिपाठी ने भूमिका में पृष्ठ 6 एवं 7 पर वाग्भट्ट के काल का उल्लेख करते हुये विभिन्न विद्वानों के मतों का उल्लेख किया है. जिसमें इनका काल द्वितीय ईसा पूर्व के (कुण्टे)से 13वीं सदी(कार्डियर)तक बताया गया है. लेकिन अन्तिम रूप से इनका काल तीसरी से 5वीं सदी बताया गया है. वाग्भट्ट ने अपने पितामह की उपाधि को ग्रहण किया था. अतः इस शब्द का अस्तित्व इस अष्टांग संग्रह के रचनाकार से पूर्व का सिद्ध होता है. इसी प्रकार से इसी भूमिका में कई वाग्भट्टों का उल्लेख है. इससे भी ५से तीसरी सदी के पूर्व का स्वीकार किया जाना चाहिये. इसी क्रम में निवेदन करना चाहूँगा कि यह शब्द अचानक वाग्भट्ट या उनके पितामह के समय में ही तो अस्तितवान नहीं हुआ होगा. अवश्य ही इस शब्द की परम्परा इससे पूर्व की ही रही होगी तभी वाग्भट्ट तथा उनके पितामह के साथ यह शब्द जुड़ा. जैसा कि स्वयं आपकी पुस्तक के अध्याय 24 से भी स्पष्ट है. अतः इतने प्रमाणों के रहते हुये पूज्य डा॰सोम की इन पंक्तियों " परन्तु संस्कृत के प्राचीन साहित्य में इसका कहीं उल्लेख नहीं है" कैसे स्वीकार किया जा सकता है?
चुंकि आप इस पुस्तक के रचनाकार हैं तथा अध्याय 24 एवं अध्याय 27 में डा॰ साहब की इन पंक्तियों पर आपकी क्या राय है, पाठकों को स्पष्ट होना चाहिये था. वस्तुतः भट्ट शब्द की परम्परा ईसापूर्व से ही स्वीकार किया जाना चाहिये. इसी पैराग्राफ में डा॰सोम आगे लिखते हैं कि " कुछ विद्वानों की सम्मति में यह शब्द तो प्राचीन है परन्तु पुर्वागत आर्यों के एक समुदाय के साथ सम्बद्ध है. यह समुदाय युद्धशील भी था और ज्ञानशील भी. इतिहासकार इस विषय में एक मत हैं कि परागत आर्यों ने पूर्वागत आर्यों को भारतवर्ष की गंगा-यमुना की हरी-भरी शस्य-श्यामल भूमि से खदेड़ दिया. परिणामतः वे सीमान्त प्रदेशों में फैल गये. यही कारण है कि भट्टों का समुदाय या तो अपनी पूर्व गरिमा लिये हुये काश्मीर में विद्यमान है या पूर्वी और दक्षिणी प्रदेशों में "
इन पंक्तियों से यह स्पष्ट होता है कि डा॰सोम के अनुसार भट्ट शब्द धारी आर्य गंगा-यमुना की हरी-भरी शस्य-श्यामल भूमि में नहीं हैं. अब इन पंक्तियों से असहमति व्यक्त करने हेतु तो मैं यही कहूँगा कि डा॰सोम का गृह जनपद आगरा है जो यमुना के किनारे बसा है. आप स्वयं भी हम सभी के साथ इसी गंगा-यमुना की हरी-भरी शस्य-श्यामल भूमि के निवासी हैं.आश्चर्य हो रहा है कि डा॰सोम जैसा विद्वान व्यक्ति ऐसी आधारहीन अतार्किक अप्रमाणित बात कैसे कह दिया. यह भट्ट ब्राह्मण ही तो हैं जो हिन्दू जाति के चारों वर्णों में सम्पूर्ण भारत में जहाँ-जहाँ आर्य संस्कृति है (पूर्वोत्तर भारत की संस्कृति मेघालय, अरुणांचल, नागालैण्ड इत्यादि जनजातीय संस्कृति है) वहाँ-वहाँ पर न्यूनाधिक उपस्थित है. अन्यथा ब्राह्मण वर्गीय अन्य जातियां जो उत्तर भारत में हैं दक्षिण भारत में नहीं, क्षत्रिय और वैश्य वर्ण दक्षिण भारत में है ही नहीं. (इ॰एच॰आई॰ - 03 भारत 8वीं सदी से 15वीं सदी तक, समाज और संस्कृति आठवीं से 13वीं सदी तक, भाग - 2, पृष्ठ 9, 5.6.2 बंगाल एवं दक्षिण भारत में मध्यम वर्णों का अभाव.) शुद्र वर्ण के जाति मूलक शब्द भी उत्तर और दक्षिण भारत में अलग अलग हैं.
उत्तर भारत में आर्यो के बीच युद्ध की जहाँ तक बात है, आर्यों के जनों के बीच एक युद्ध का उल्लेख है जिसे दसराज्ञ युद्ध कहा गया है. एक तरफ भरतों के राजा सुदास, जिनके पुरोहित वशिष्ठ तथा दूसरी तरफ राजाओं का संघ जिनके पुरोहित ऋषि विश्वामित्र थे, जिसमें भरतजन के स्वामी सुदास विजयी हुये. इस प्रकार सुदास ऋगवैदिक कालीन सम्राट हुये तथा भरत जन के नाम पर इस देश का नाम भारत पड़ा. यही युद्ध परागत और पूर्वागत आर्यों में हुआ जो रावी के तट पर हुआ था. पूर्वागत पश्चिमोत्तर प्रदेश से थे जहाँ परागत ब्रह्मवर्त के. (प्राचीन भारत का इतिहास, भारत में आर्य तथा पूर्ववैदिक कालीन सभ्यता, पृष्ठ ५१)