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प्रिय पाठक बन्धु इस भूमिका के पश्चात् एक लम्बा सा, लगभग ७० ७५ पृष्ठों का, पत्र, जो मैंने श्री लक्ष्मीनारायण आर॰शर्मा को लिखा है, आपकी प्रतीक्षा कर रहा है. आखिर आप इसे क्यों पढ़ें, क्या है इस पत्र में, इस पत्र को लिखने का मेरा उद्देश्य क्या रहा, ये कुछ ऐसे बिन्दु हैं जिन्हें स्पष्ट करना मैं आवश्यक समझता हूँ जिससे इस लम्बे पत्र को पढ़ने में आपको सहजता हो. श्री लक्ष्मीनारायण आर॰शर्मा, जिन्होंने ब्रह्मभट्ट चरितम् नामक पुस्तक लिखी है, के कुछ बिन्दुओं से मैं सहमत नहीं हो पाया. यह असहमति क्यों है, क्या होता तो मेरी समझ से सही होता यही इस पत्र में है. असहमति के बिन्दु हैं - भट्ट शब्द का उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत तक प्रसार क्यों और कैसे. प्रारम्भिक चार पाँच पृष्ठों में लेखक से मेरी इस बिन्दु पर असहमति क्यों है, इसकी चर्चा है. इसके बाद मेरी समझ से यह शब्द कैसे और क्यों उत्तर से दक्षिण भारत तक फैला, इस पर अपने विचार रखे गये हैं. मैंने इस प्रक्रिया को बौद्ध-ब्राह्मण संघर्ष की पृष्ठभूमि में आर्यों (ब्राह्मण) के दक्षिण भारत में उत्प्रवास, दक्षिण का आर्यीकरण के साथ देखने का प्रयास किया है. वस्तुतः बौद्ध-ब्राह्मण संघर्ष प्रारम्भिक भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है, जो आज नहीं है और हम सब लगभग इससे अपरिचित हैं. मेरी समझ से महाकाव्यों, विशेष रूप से रामायण, की रचना भी इसी पृष्ठभूमि में बौद्ध धर्म के प्रभाव को समाप्त करने के लिये हुयी है. विनम्रतापूर्वक कहना चाहूँगा कि सम्भवतः यह आपको एक नयी चीज लगे. तत्पश्चात् भट्ट शब्द की निष्पत्ति तथा संस्कृत भाषा के व्यवहार की भाषा होने न होने पर लेखक से असहमति यथासम्भव साक्ष्यों के साथ है. रामायण और राम, इतिहास हैं या साहित्य, यह एक विवाद का विषय विज्ञजनों के बीच हमेशा रहा है. इसी के सन्दर्भ में मेरी प्रथम टिप्पणी है - राम , इतिहास और साहित्य. राम इतिहास हैं या एक साहित्यक पात्र, यह निर्णय इस टिप्पणी को पढ़ने के पश्चात् आपको ही करना है. दूसरी टिप्पणी है - रामायण में बौद्ध धर्म का उल्लेख. यह पत्र लिखते समय कुछ तरफ से यह प्रश्न आया कि रामायण में बौद्ध प्रभाव नहीं है तो कैसे इसे इस पृष्ठभूमि में स्वीकार किया जाय. इसी प्रश्न का उत्तर देती हुयी सी यह टिप्पणी है. मेरी सफलता असफलता के निर्णायक आप ही हैं. तीसरी टिप्पणी है - वाणभट्ट की आत्मकथा और इतिहास. आचार्य द्विवेदी के इस उपन्यास के कुछ अंशों को मैंने ऐतिहासिक साक्ष्य के रूप में इस पत्र में रखा है, फलतः यह आवश्यक लगा कि इतिहास की दृष्टि से इस पुस्तक का क्या महत्व है इसकी चर्चा की जाय. चौथी टिप्पणी में कुछ ऐसे शब्दों की, जिनको लेकर भट्ट जाति तथा इसके बाहर भी एक भ्रम की स्थिति है, शब्दकोष के आलोक में व्याख्या करने का प्रयास किया गया है. पाँचवी टिप्पणी सन्दर्भिका है और उसके पश्चात् उन सब लोगों को प्रणाम है जिनके आशीर्वाद से ही यह लम्बा पत्र लिखा जा सका है. एक चित्रवीथिका भी है जिसमें आप सभी के चित्र हैं. तत्पश्चात मत-अभिमत आशीष खण्ड है जिसका प्रारम्भ डा॰ आद्याप्रसाद द्विवेदी के आशीर्वचन से हो रहा है. आशा है आप भी अपने बहुमूल्य समय का कुछ अंश इस पत्र को देगें. सहमति असहमति तथा अपने सुझावों से मुझे अवगत करायेंगे, मेरा उत्साहवर्द्धन करेंगे. अपनी टिप्पणियाँ आप dransharma@bhattvihangawalokan.com को भेजें तो मुझे खुशी होगी. चुनी गयी टिप्पणियों को इस साइट पर भी प्रकाशित किया जायेगा. दुनिया के सामने इस पत्र को रखते हुये कविवर बच्चन को उद्धृत करने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा हूँ -
शुभकामनाओं के साथ, आप सभी का अमर पूरी सामग्री ई-पुस्तक के रूप में भी उपलब्ध है. Guestbook |
